कहर टूट पड़ा है पाकिस्तानी हिन्दुओं पर
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पाठक पन्ना | Written by सुरेश शर्मा | बुधवार , 17 दिसम्बर 2008
दैनिक जागरण ने अमृतसर से खबर दी है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों में आई 'खटास' का 'कहर' पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू परिवारों पर किस कदर टूट रहा है। पिछले कुछ दिनों में हिंदू परिवारों की महिलाओं से दुष्कर्म एवं उनकी दुकानें व घरों को लूटा गया। उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि या तो वह मजहब बदल लें या फिर देश। हिंदू परिवार वहां से पलायन करके यहां आ रहे हैं।
सोमवार को समझौता एक्सप्रेस से आए दो हिंदू परिवारों ने अपनी दुखभरी कहानी मीडिया को बताई। वहां से आने वालों में खन्या देवी [50] मुकेश [30], शोभा [28], शिवानी [4], वीर [2], सुरेश कुमार [25], कविता [23], साइना [7], शिवराज [4] व विसाखा [3] शामिल हैं। सिंध प्रांत से भारत पहुंचे दोनों परिवारों ने कहा कि वह किसी कीमत पर पाकिस्तान नहीं जाना चाहते। अगर भारत सरकार ने उन्हें यहां पर रहने की इजाजत नहीं दी तो वे पूरे परिवार के साथ ट्रेन से कटकर जान दे देंगे। हिंदू परिवारों का कहना है कि पाक में वही हाल दोहराया जा रहा है जो बँटवारे के दौरान हुआ था। वहां के जमींदार व पुलिस खुद यह घिनौना खेल खेलने में लगी है।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अब हिंदू परिवारों का रहना मुश्किल हो गया है। बहू-बेटियों से दुष्कर्म किया जा रहा है। बच्चों को अगवा करके फिरौती मांगी जा रही है। वहां के हुक्मरान का यही सवाल है कि या तो मजहब बदल लो या फिर देश। उन्होंने बताया कि 45 दिन का वीजा उन्हें मिला है, लेकिन वह भारतीय हुकूमत से भारत में शरण देने की गुजारिश करेंगे। इन लोगों का कहना है कि ऐसे करीब 35 हिंदू परिवार हैं जो कि भारत आने के लिए पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास के चक्कर लगा रहे हैं।
अब चार चक्र की सुरक्षा से गुजरना होगा
भारत-पाकिस्तान के बीच बनते-बिगड़ते हालातों को लेकर समझौता एक्सप्रेस में मुसाफिरों की गिनती कम हुई है। साथ ही पाकिस्तान से आने वाले मुसाफिरों की जांच के लिए स्पेशल टीमों का गठन किया गया है। हरेक मुसाफिरों को चार बार सुरक्षा कवच से गुजरने के बाद क्लीन चिट दी जा रही है। खुफिया विभाग की माने तो समझौता एक्सप्रेस भी आतंकियों के निशाने पर है। इसलिए सुरक्षा और पुख्ता कर दी गई है।
Thursday, December 18, 2008
प्लास्टिक को सोने में बदला
मुंबई से प्रकाशित नवभारत टाईम्स में अनुराग त्रिपाठी ने रोचक और प्रेरणादायी खबर दी है, किस तरह मुंबई के एक वैज्ञानिक दंपत्ति ने कचरे में फेंकी गई प्लास्टिक की थैलियों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से गलाकर पेट्रॉल में बदलने में सफलता हासिल की है। जानी-मानी वैज्ञानिक जोड़ी महेश्वर शरण और उनकी पत्नी माधुरी ने ऐसी तकनीक विकसित की है , जिससे 25 किलो प्लास्टिक की थैलियों से लगभग 25 लीटर पेट्रॉल बनाया जा सकता है।
महेश्वर आईआईटी (मुंबई) के केमिकल टेक्नॉलजी विभाग से सेवा निवृत्त चुके हैं। वे भारत में कार्बन नैनो-टेक्नॉलजी के जनक माने जाते हैं। उनकी पत्नी माधुरी ' रिलायंस लाइफसाइंसेज ' के निदेशक का पद छोड़ चुकी हैं। पति-पत्नी के निर्देशन में 22 वैज्ञानिक नैनो-टेक्नॉलजी के विभिन्न क्षेत्रों में शोध कर रहे हैं।
माधुरी बताती हैं कि 26 जुलाई 2005 को मुंबई की सड़कों पर पानी ही पानी नजर आ रहा था। सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों को इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया था , जिसकी वजह से नालियाँ बंद हो जाती हैं। यह आशंका भी जताई जाती रही है कि प्लास्टिक की थैलियां कई पीढ़ियों के लिए सिरदर्द बनेंगी , क्योंकि ये हजारों साल तक नष्ट नहीं होंगी।
इन हालात में कल्याण के बिरला कॉलेज में सीएसआईआर की सहायता से बने भारत के एकमात्र ' नैनो बॉयो-टेक्नॉलजी सेंटर ' में युद्धस्तर पर काम शुरू हुआ। महीने भर में प्लास्टिक को पिघलाकर मोम (वैक्स) बनाने की तकनीक विकसित की गई। इस वैज्ञानिक जोड़ी ने सितंबर 2005 को महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर बताया कि प्लास्टिक के संकट पर हल निकाल लिया गया है। लेकिन ाज तक सरकार ने उनके पत्रका जवाब देना तक उचित नहीं समझ है। लेिकन इनकी उपलब्धि की चमक केंद्रीय पर्यावरण विभाग तक पहुँची और दिल्ली में प्लास्टिक से वैक्स बनाने का संयंत्र कागजों पर दौड़ लगा रहा है। यह संयंत्र वास्तव में आकार ले पाता , इससे पहले शरण दंपती की लैब में प्लास्टिक से पेट्रॉलियम बनाए जाने की नई खबर ने हलचल मचा दी है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ' क्लीन फ्यूल ' है। न तो परीक्षण में किसी तरह की जहरीली गैस निकलती है , न ही कोई केमिकल कचरा बचता है। सभी कुछ या तो वैक्स या पेट्रॉल में बदल जाता है या फिर मीथेन गैस में , जिसका उपयोग फिर ऊर्जा के तौर पर किया जा सकता है। एक और बात यह भी कि इस पेट्रोल में खतरनाक लेड बिल्कुल नदारद है।
महेश्वर आईआईटी (मुंबई) के केमिकल टेक्नॉलजी विभाग से सेवा निवृत्त चुके हैं। वे भारत में कार्बन नैनो-टेक्नॉलजी के जनक माने जाते हैं। उनकी पत्नी माधुरी ' रिलायंस लाइफसाइंसेज ' के निदेशक का पद छोड़ चुकी हैं। पति-पत्नी के निर्देशन में 22 वैज्ञानिक नैनो-टेक्नॉलजी के विभिन्न क्षेत्रों में शोध कर रहे हैं।
माधुरी बताती हैं कि 26 जुलाई 2005 को मुंबई की सड़कों पर पानी ही पानी नजर आ रहा था। सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों को इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया था , जिसकी वजह से नालियाँ बंद हो जाती हैं। यह आशंका भी जताई जाती रही है कि प्लास्टिक की थैलियां कई पीढ़ियों के लिए सिरदर्द बनेंगी , क्योंकि ये हजारों साल तक नष्ट नहीं होंगी।
इन हालात में कल्याण के बिरला कॉलेज में सीएसआईआर की सहायता से बने भारत के एकमात्र ' नैनो बॉयो-टेक्नॉलजी सेंटर ' में युद्धस्तर पर काम शुरू हुआ। महीने भर में प्लास्टिक को पिघलाकर मोम (वैक्स) बनाने की तकनीक विकसित की गई। इस वैज्ञानिक जोड़ी ने सितंबर 2005 को महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर बताया कि प्लास्टिक के संकट पर हल निकाल लिया गया है। लेकिन ाज तक सरकार ने उनके पत्रका जवाब देना तक उचित नहीं समझ है। लेिकन इनकी उपलब्धि की चमक केंद्रीय पर्यावरण विभाग तक पहुँची और दिल्ली में प्लास्टिक से वैक्स बनाने का संयंत्र कागजों पर दौड़ लगा रहा है। यह संयंत्र वास्तव में आकार ले पाता , इससे पहले शरण दंपती की लैब में प्लास्टिक से पेट्रॉलियम बनाए जाने की नई खबर ने हलचल मचा दी है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ' क्लीन फ्यूल ' है। न तो परीक्षण में किसी तरह की जहरीली गैस निकलती है , न ही कोई केमिकल कचरा बचता है। सभी कुछ या तो वैक्स या पेट्रॉल में बदल जाता है या फिर मीथेन गैस में , जिसका उपयोग फिर ऊर्जा के तौर पर किया जा सकता है। एक और बात यह भी कि इस पेट्रोल में खतरनाक लेड बिल्कुल नदारद है।
Friday, May 16, 2008
खाडी के देशों में हिंदी का विकास
हिंदी आज केवल भारत की भाषा नहीं है। नेपाल, पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका में तो हिंदी बोली ही जाती है खाडी क़े देशों में से संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ईराक व सऊदी में भी हिंदी रोज क़ी बोलचाल जैसी भाषा है । दुबई और शारजाह में धनी यूरोपीय और शासक वर्ग के अरबी लोगों को छोड दें तो लगभग हर व्यक्ति हिंदी बोलता और समझता है।
दैनिक जरूरतों के काम करने वाले लोग जैसे घरों में काम करने वाली महिलाएं, टैक्सी ड्राइवर, घर की सफाई का काम करने वाले लोग, सब्जी बेचने वाले, सुपर मार्केट के कर्मचारी और सोने या कपड़े क़ी दूकानवाले सब हिंदी समझते और बोलते हैं। यह सच है कि इसमें से ज्यादातर भारतीय हैं लेकिन जो लोग भारतीय नहीं हैं या जो भारतीय है पर जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है वे भी यहां हिंदी का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंकन महिलाएं जो घर की सफाई का काम करती हैं उनमें से निन्यानबे प्रतिशत हिंदी बोलती हैं। टैक्सी ड्राइवर भले ही अरबी हो पर वह हिंदी बोलना और समझना जानता है। अपने दस साल के प्रवास में मुझे शायद कभी एक टैक्सी ड्राइवर मिला होगा जो हिंदी नहीं जानता होगा। यही नहीं पुलिस अस्पताल हवाई अड्डे और डाकखाने जैसे सभी सरकारी कार्यालयों में लगभग सभी अरबी मूल के लोग हिंदी बोलते हैं।
फिर भी हिंदी का विकास यहाँ एक बोली के रूप में हो रहा है । ज्ञान-विज्ञान साहित्य, संस्कृति और कला की समृद्ध भाषा के रूप में जो सम्मान उसको मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। वह प्रतिष्ठित लोगों की भाषा नहीं बन सकी है। हिंदी के नाटक, कवि सम्मेलन और फिल्मों को देखने जो आभिजात्य भीड़ उमडती है वह आपस में बातचीत के लिए भारतीयों की तरह अंग्रेजियत पर ही उतर आती है। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि स्वयं भारत के भीतर हम हिंदी को वह सम्मान नहीं दे सके हैं जो उसको मिलना चाहिए। इसी कारण भारतीय दूतावास भी या तो हिंदी के विकास का काम करते ही नहीं या बहुत ही ढीला-ढाला करते हैं ।
इसकी तुलना में अगर हम विदेशी दूतावासों को देखें तो पता चलेगा कि वे अपनी भाषा के विकास के लिए कितना ज्यादा काम करते हैं। अगर आज विश्व में अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं की इज्ज़त है तो वह इसलिए कि उस देश के लोग अपनी भाषा के विकास में जो जी-जान लगा रहे हैं उसके पीछे उन देशों की सरकारों का प्रबल सहयोग है। अगर हमें हिंदी के प्रेमी खाडी देशों में अपनी भाषा के विकास का काम करना है तो विदेशी दूतावासों से सबक लेना जरूरी है।
ब्रिटेन तथा यूनाइटेड स्टेट्स की तरह खाडी क़े देशों में अरबी-हिंदी के संयुक्त प्रयासों को बढाने की जरूरत है। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अरबी की स्नातक या स्नातकोत्तर पढाई की व्यवस्था है। लेकिन यू. ए. ई. के किसी भी विश्वविद्यालय में हिंदी स्नातक या परास्नातक कक्षाओं में नहीं पढाई जाती है। अगर यहां इसी प्रकार हिंदी की व्यवस्था हो जाए तो हिंदी और अरबी के समकालीन साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन की व्यवस्था हो सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था दोनों देशों को साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
मैं बहुत सी ऐसी विदेशी महिलाओं से मिली हूँ जो गृहणियां है। वे खाली समय में हिंदी लिखना, पढना या बोलना सीखना चाहती हैं। अनेक यूरोपीय व अमरीकी छात्र-छात्राएं भारत-पर्यटन के लिए सामान्य हिंदी बोलने व लिखने-पढने की इच्छा रखते हैं। कपडों के उद्योग तथा अन्य कार्यों में लगी अनेक महिलाएं (पुरुष भी) हिंदी सीखना चाहते हैं ताकि वे अपने सहकर्मियों (जो अधिकतर हिंदी में बात करते हैं) के साथ हिंदी बोलने का मज़ा उठा सकें। हम इन सबके लिए विभिन्न स्तरों की हिंदी पढाए जाने की व्यवस्था कर सकते हैं। यह व्यवस्था दूतावास की ओर से हो सकती है या हिंदी संस्थाओं की ओर से या फिर शिक्षा संस्थाओं की ओर से। जिस प्रकार ब्रिटिश और फ्रेंच दूतावास अंग्रेजी और फ्रेंच कक्षाएं चलाते हैं और उनका धुआंधार विज्ञापन करते हैं ऐसी व्यवस्था भारतीय दूतावास से हिंदी के लिए होनी चाहिए।
विदेशी दूतावासों में अपनी अपनी भाषा के अति संपन्न पुस्तकालय होते हैं। ब्रिटिश लायब्रेरी तो अंग्रेजी क़ी श्रेष्ठतम पुस्तकों के लिए हर जगह प्रसिध्द होती है। इसी के समकक्ष भारतीय दूतावास में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हिंदी पुस्तकालय होना चाहिए, जो अन्य पुस्तकालयों से कंप्यूटर द्वारा जुडा हो और अगर कोई पुस्तक पुस्तकालय में उपलब्ध न हो तो उसको एक हफ्ते के अंदर मंगा का दिया जा सके। इसके अतिरिक्त यहाँ किताबों की दुकान चलाने वाले लोगों को हिंदी पुस्तके व पत्रिकाएं बेचने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
इतनी शिकायतें लिखने का मतलब यह नहीं है कि यहां हिंदी के विकास के लिए कुछ नहीं हो रहा है. प्रवासी भारतीय परदेस जाकर हिंदी तथा भारत का महत्व अधिक गहराई से महसूस करता है। जब तक वह भारत में रहता है तो हिंदी तथा भारतीय संस्कृति उसके लिए घर की मुर्गी दाल बराबर होती है। विदेश में जाकर वहां की चकाचौंध के पीछे छिपी वास्तविकता को देखने के बाद, उसे हिंदी तथा हिंदी में अभिव्यक्त होने वाली भारतीय संस्कृति की याद आती है। इस समय वह हिंदी के विकास और जुडाव में लगता है। प्रवासी भारतीयों में ऐसे हजारों लोग खाडी क़े देशों में भी हिंदी के विकास में संलग्न हैं।
यू. ए. ई. में हिंदी कार्यक्रमों का आयोजन करने वाली कई संस्थाएं हैं। ‘प्रतिबिंब’ नामक एक नाटक संस्था भी है जो 1996 से हर वर्ष एक हिंदी नाटक दुबई में खेलते रहे है। प्रतिबिंब नाम की इस अव्यवसायिक संस्था के अध्यक्ष महबूब हसन रिजवी साहब हैं। इस संस्था ने हिंदी की नाटयकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त मेरी अपनी पत्रिकाओं अभिव्यक्ति व अनुभूति के चार अंक हर महीने प्रकाशित किए जाते हैं। इन अंकों को पुरालेखों में इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि वे आज वेब पर हिंदी का सबसे बड़ा साहित्य कोश बन गए हैं।
यू. ए. ई. में एफ. एम. के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं जिनपर चौबीसों घंटे हिंदी गाने समाचार और अन्य कार्यक्रम सुने जा सकते हैं। दिन भर इन पर अंतर्राष्ट्रीय उत्पादों के विज्ञापन सुने जा सकते हैं। यह इस बात का सबूत है कि हिंदी खूब लोकप्रिय है और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां अपने माल बेचने के लिए हिंदी के महत्व को गंभीरता से महसूस करती हैं। व्यापार में इस प्रकार हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय जरूरत को हिंदी की ताकत समझा जाना चाहिए।
बहुत कम लोग जानते हैं कि वेब पर एक 'मध्यपूर्व हिंदी समिति' भी है। इस वेब साइट को कुवैत में रहने वाले जितेन्द्र चौधरी चलाते हैं। इसमें अपना खाता खोलने के बाद आप कोई भी महत्वपूर्ण लेख या सुझाव प्रकाशित कर सकते हैं। इसके जरिये मध्यपूर्व के लेखकों, शिक्षाविदों और हिंदी कर्मियों को जोडा जा सकता है। इस वेब समिति के अंतर्गत हम स्कूलों की अंतर्राष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता या कहानी प्रतियोगिता आयोजित कर सकते हैं। इस समिति का कोई सदस्यता-शुल्क नहीं है।
यू. ए. ई. में हिंदी लेखन के क्षेत्र में श्री कृष्ण बिहारी ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है. उन्होंने अरबी परिवेश को चित्रित करने वाली सौ से अधिक कहानियां लिखी हैं जो हंस से लेकर दैनिक जागरण तक लगभग हर पत्र पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। अनुवाद के क्षेत्र में कांता भाटिया ने डा मोती प्रकाश के संस्मरणों के हिंदी अनुवाद का महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त यदाकदा लिखने वाले और प्रकाशित होने वाले लेखक और कवि भी कई है जिनकी रचनाएं समय समय पर अभिव्यक्ति और अनुभूति की शोभा बढाती हैं।
कुल मिला कर कहा जाए तो संभावनाएं बहुत है पर जिस शक्ति और श्रम के साथ काम करने की जरूरत है वह हम पूरी तरह जुटा नहीं पाए हैं।
दैनिक जरूरतों के काम करने वाले लोग जैसे घरों में काम करने वाली महिलाएं, टैक्सी ड्राइवर, घर की सफाई का काम करने वाले लोग, सब्जी बेचने वाले, सुपर मार्केट के कर्मचारी और सोने या कपड़े क़ी दूकानवाले सब हिंदी समझते और बोलते हैं। यह सच है कि इसमें से ज्यादातर भारतीय हैं लेकिन जो लोग भारतीय नहीं हैं या जो भारतीय है पर जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है वे भी यहां हिंदी का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंकन महिलाएं जो घर की सफाई का काम करती हैं उनमें से निन्यानबे प्रतिशत हिंदी बोलती हैं। टैक्सी ड्राइवर भले ही अरबी हो पर वह हिंदी बोलना और समझना जानता है। अपने दस साल के प्रवास में मुझे शायद कभी एक टैक्सी ड्राइवर मिला होगा जो हिंदी नहीं जानता होगा। यही नहीं पुलिस अस्पताल हवाई अड्डे और डाकखाने जैसे सभी सरकारी कार्यालयों में लगभग सभी अरबी मूल के लोग हिंदी बोलते हैं।
फिर भी हिंदी का विकास यहाँ एक बोली के रूप में हो रहा है । ज्ञान-विज्ञान साहित्य, संस्कृति और कला की समृद्ध भाषा के रूप में जो सम्मान उसको मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। वह प्रतिष्ठित लोगों की भाषा नहीं बन सकी है। हिंदी के नाटक, कवि सम्मेलन और फिल्मों को देखने जो आभिजात्य भीड़ उमडती है वह आपस में बातचीत के लिए भारतीयों की तरह अंग्रेजियत पर ही उतर आती है। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि स्वयं भारत के भीतर हम हिंदी को वह सम्मान नहीं दे सके हैं जो उसको मिलना चाहिए। इसी कारण भारतीय दूतावास भी या तो हिंदी के विकास का काम करते ही नहीं या बहुत ही ढीला-ढाला करते हैं ।
इसकी तुलना में अगर हम विदेशी दूतावासों को देखें तो पता चलेगा कि वे अपनी भाषा के विकास के लिए कितना ज्यादा काम करते हैं। अगर आज विश्व में अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं की इज्ज़त है तो वह इसलिए कि उस देश के लोग अपनी भाषा के विकास में जो जी-जान लगा रहे हैं उसके पीछे उन देशों की सरकारों का प्रबल सहयोग है। अगर हमें हिंदी के प्रेमी खाडी देशों में अपनी भाषा के विकास का काम करना है तो विदेशी दूतावासों से सबक लेना जरूरी है।
ब्रिटेन तथा यूनाइटेड स्टेट्स की तरह खाडी क़े देशों में अरबी-हिंदी के संयुक्त प्रयासों को बढाने की जरूरत है। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अरबी की स्नातक या स्नातकोत्तर पढाई की व्यवस्था है। लेकिन यू. ए. ई. के किसी भी विश्वविद्यालय में हिंदी स्नातक या परास्नातक कक्षाओं में नहीं पढाई जाती है। अगर यहां इसी प्रकार हिंदी की व्यवस्था हो जाए तो हिंदी और अरबी के समकालीन साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन की व्यवस्था हो सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था दोनों देशों को साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
मैं बहुत सी ऐसी विदेशी महिलाओं से मिली हूँ जो गृहणियां है। वे खाली समय में हिंदी लिखना, पढना या बोलना सीखना चाहती हैं। अनेक यूरोपीय व अमरीकी छात्र-छात्राएं भारत-पर्यटन के लिए सामान्य हिंदी बोलने व लिखने-पढने की इच्छा रखते हैं। कपडों के उद्योग तथा अन्य कार्यों में लगी अनेक महिलाएं (पुरुष भी) हिंदी सीखना चाहते हैं ताकि वे अपने सहकर्मियों (जो अधिकतर हिंदी में बात करते हैं) के साथ हिंदी बोलने का मज़ा उठा सकें। हम इन सबके लिए विभिन्न स्तरों की हिंदी पढाए जाने की व्यवस्था कर सकते हैं। यह व्यवस्था दूतावास की ओर से हो सकती है या हिंदी संस्थाओं की ओर से या फिर शिक्षा संस्थाओं की ओर से। जिस प्रकार ब्रिटिश और फ्रेंच दूतावास अंग्रेजी और फ्रेंच कक्षाएं चलाते हैं और उनका धुआंधार विज्ञापन करते हैं ऐसी व्यवस्था भारतीय दूतावास से हिंदी के लिए होनी चाहिए।
विदेशी दूतावासों में अपनी अपनी भाषा के अति संपन्न पुस्तकालय होते हैं। ब्रिटिश लायब्रेरी तो अंग्रेजी क़ी श्रेष्ठतम पुस्तकों के लिए हर जगह प्रसिध्द होती है। इसी के समकक्ष भारतीय दूतावास में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हिंदी पुस्तकालय होना चाहिए, जो अन्य पुस्तकालयों से कंप्यूटर द्वारा जुडा हो और अगर कोई पुस्तक पुस्तकालय में उपलब्ध न हो तो उसको एक हफ्ते के अंदर मंगा का दिया जा सके। इसके अतिरिक्त यहाँ किताबों की दुकान चलाने वाले लोगों को हिंदी पुस्तके व पत्रिकाएं बेचने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
इतनी शिकायतें लिखने का मतलब यह नहीं है कि यहां हिंदी के विकास के लिए कुछ नहीं हो रहा है. प्रवासी भारतीय परदेस जाकर हिंदी तथा भारत का महत्व अधिक गहराई से महसूस करता है। जब तक वह भारत में रहता है तो हिंदी तथा भारतीय संस्कृति उसके लिए घर की मुर्गी दाल बराबर होती है। विदेश में जाकर वहां की चकाचौंध के पीछे छिपी वास्तविकता को देखने के बाद, उसे हिंदी तथा हिंदी में अभिव्यक्त होने वाली भारतीय संस्कृति की याद आती है। इस समय वह हिंदी के विकास और जुडाव में लगता है। प्रवासी भारतीयों में ऐसे हजारों लोग खाडी क़े देशों में भी हिंदी के विकास में संलग्न हैं।
यू. ए. ई. में हिंदी कार्यक्रमों का आयोजन करने वाली कई संस्थाएं हैं। ‘प्रतिबिंब’ नामक एक नाटक संस्था भी है जो 1996 से हर वर्ष एक हिंदी नाटक दुबई में खेलते रहे है। प्रतिबिंब नाम की इस अव्यवसायिक संस्था के अध्यक्ष महबूब हसन रिजवी साहब हैं। इस संस्था ने हिंदी की नाटयकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त मेरी अपनी पत्रिकाओं अभिव्यक्ति व अनुभूति के चार अंक हर महीने प्रकाशित किए जाते हैं। इन अंकों को पुरालेखों में इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि वे आज वेब पर हिंदी का सबसे बड़ा साहित्य कोश बन गए हैं।
यू. ए. ई. में एफ. एम. के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं जिनपर चौबीसों घंटे हिंदी गाने समाचार और अन्य कार्यक्रम सुने जा सकते हैं। दिन भर इन पर अंतर्राष्ट्रीय उत्पादों के विज्ञापन सुने जा सकते हैं। यह इस बात का सबूत है कि हिंदी खूब लोकप्रिय है और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां अपने माल बेचने के लिए हिंदी के महत्व को गंभीरता से महसूस करती हैं। व्यापार में इस प्रकार हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय जरूरत को हिंदी की ताकत समझा जाना चाहिए।
बहुत कम लोग जानते हैं कि वेब पर एक 'मध्यपूर्व हिंदी समिति' भी है। इस वेब साइट को कुवैत में रहने वाले जितेन्द्र चौधरी चलाते हैं। इसमें अपना खाता खोलने के बाद आप कोई भी महत्वपूर्ण लेख या सुझाव प्रकाशित कर सकते हैं। इसके जरिये मध्यपूर्व के लेखकों, शिक्षाविदों और हिंदी कर्मियों को जोडा जा सकता है। इस वेब समिति के अंतर्गत हम स्कूलों की अंतर्राष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता या कहानी प्रतियोगिता आयोजित कर सकते हैं। इस समिति का कोई सदस्यता-शुल्क नहीं है।
यू. ए. ई. में हिंदी लेखन के क्षेत्र में श्री कृष्ण बिहारी ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है. उन्होंने अरबी परिवेश को चित्रित करने वाली सौ से अधिक कहानियां लिखी हैं जो हंस से लेकर दैनिक जागरण तक लगभग हर पत्र पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। अनुवाद के क्षेत्र में कांता भाटिया ने डा मोती प्रकाश के संस्मरणों के हिंदी अनुवाद का महत्वपूर्ण काम किया है। इसके अतिरिक्त यदाकदा लिखने वाले और प्रकाशित होने वाले लेखक और कवि भी कई है जिनकी रचनाएं समय समय पर अभिव्यक्ति और अनुभूति की शोभा बढाती हैं।
कुल मिला कर कहा जाए तो संभावनाएं बहुत है पर जिस शक्ति और श्रम के साथ काम करने की जरूरत है वह हम पूरी तरह जुटा नहीं पाए हैं।
Wednesday, April 2, 2008
how to reburn cd
जो सीडी एक बार बर्न करने के बाद फीर कभी बर्न नही होता ऊसे हजारो बार बर्न करें।एक बार सी.डी बर्न होने के बाद फीर कभी बर्न नही होता पर मै आपको बताता हू की पहले से ही बर्न सी.डी को कैसे बर्न करेंगेईस वीधी से आपके बहूत से सी.डी बचेंगे जो सी.डी के 702 एम.बी मे सीर्फ १०० एम.बी का ही प्र्योग कर के बर्न कर देते हैं और जो बचा होता है वो बेकार ही जाता है उस्का कोई य़ूज नही होता।क्या आपके पास नीरो का सोफ्ट्वेयर है? अगर हां तो ठीक है और अगर नही है तो आप ईसे सी.डी ड्राईव की मद्त से कर सकतें हैं।सबसे पहले नीरो को खोलें फीर "मेक डाटा डीस्क" पर क्लिक करें और कोई भी फाईल चूने जीसे बर्न करना होगा। यदी आपने कोई २ या तीन फाईल चूनी है जीसका साईज 400 MB हो। अब सीडी मे 202MB का स्पेस बचता है। अब नेक्सट पर क्लिक कर दें अब आपको एक मेनू दीखेगा स्क्रीन साट मे वो मेनू देखें। अब "Allow Files to be added later (Multisession disc )" ईस मेनू को सलेक्ट कर दें। अब बर्न पर क्लिक कर दें। अब जब बर्न हो जाए तो ऊसे नीकाल ले।अब मान लें की आपको कूछ ही दीन बाद एक और फाईल सीडी मे राईट कर्ना हो तो आप ऊसी बर्न सीडी मे आप दोबारा कोई फाईल बर्न कर दें। पहले से जो फाईल है सीडी मे ऊसको डीलीट भी कर सकतें हैंऊपयोगीता --> आपका रीजयूम जीसे अपडेट करना हो।--> कोई भी डाटा।एक ही सीडी कई बार प्रयोग करें ० है ना मजे की बात!!
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