कहर टूट पड़ा है पाकिस्तानी हिन्दुओं पर
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पाठक पन्ना | Written by सुरेश शर्मा | बुधवार , 17 दिसम्बर 2008
दैनिक जागरण ने अमृतसर से खबर दी है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों में आई 'खटास' का 'कहर' पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू परिवारों पर किस कदर टूट रहा है। पिछले कुछ दिनों में हिंदू परिवारों की महिलाओं से दुष्कर्म एवं उनकी दुकानें व घरों को लूटा गया। उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि या तो वह मजहब बदल लें या फिर देश। हिंदू परिवार वहां से पलायन करके यहां आ रहे हैं।
सोमवार को समझौता एक्सप्रेस से आए दो हिंदू परिवारों ने अपनी दुखभरी कहानी मीडिया को बताई। वहां से आने वालों में खन्या देवी [50] मुकेश [30], शोभा [28], शिवानी [4], वीर [2], सुरेश कुमार [25], कविता [23], साइना [7], शिवराज [4] व विसाखा [3] शामिल हैं। सिंध प्रांत से भारत पहुंचे दोनों परिवारों ने कहा कि वह किसी कीमत पर पाकिस्तान नहीं जाना चाहते। अगर भारत सरकार ने उन्हें यहां पर रहने की इजाजत नहीं दी तो वे पूरे परिवार के साथ ट्रेन से कटकर जान दे देंगे। हिंदू परिवारों का कहना है कि पाक में वही हाल दोहराया जा रहा है जो बँटवारे के दौरान हुआ था। वहां के जमींदार व पुलिस खुद यह घिनौना खेल खेलने में लगी है।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अब हिंदू परिवारों का रहना मुश्किल हो गया है। बहू-बेटियों से दुष्कर्म किया जा रहा है। बच्चों को अगवा करके फिरौती मांगी जा रही है। वहां के हुक्मरान का यही सवाल है कि या तो मजहब बदल लो या फिर देश। उन्होंने बताया कि 45 दिन का वीजा उन्हें मिला है, लेकिन वह भारतीय हुकूमत से भारत में शरण देने की गुजारिश करेंगे। इन लोगों का कहना है कि ऐसे करीब 35 हिंदू परिवार हैं जो कि भारत आने के लिए पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास के चक्कर लगा रहे हैं।
अब चार चक्र की सुरक्षा से गुजरना होगा
भारत-पाकिस्तान के बीच बनते-बिगड़ते हालातों को लेकर समझौता एक्सप्रेस में मुसाफिरों की गिनती कम हुई है। साथ ही पाकिस्तान से आने वाले मुसाफिरों की जांच के लिए स्पेशल टीमों का गठन किया गया है। हरेक मुसाफिरों को चार बार सुरक्षा कवच से गुजरने के बाद क्लीन चिट दी जा रही है। खुफिया विभाग की माने तो समझौता एक्सप्रेस भी आतंकियों के निशाने पर है। इसलिए सुरक्षा और पुख्ता कर दी गई है।
Thursday, December 18, 2008
प्लास्टिक को सोने में बदला
मुंबई से प्रकाशित नवभारत टाईम्स में अनुराग त्रिपाठी ने रोचक और प्रेरणादायी खबर दी है, किस तरह मुंबई के एक वैज्ञानिक दंपत्ति ने कचरे में फेंकी गई प्लास्टिक की थैलियों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से गलाकर पेट्रॉल में बदलने में सफलता हासिल की है। जानी-मानी वैज्ञानिक जोड़ी महेश्वर शरण और उनकी पत्नी माधुरी ने ऐसी तकनीक विकसित की है , जिससे 25 किलो प्लास्टिक की थैलियों से लगभग 25 लीटर पेट्रॉल बनाया जा सकता है।
महेश्वर आईआईटी (मुंबई) के केमिकल टेक्नॉलजी विभाग से सेवा निवृत्त चुके हैं। वे भारत में कार्बन नैनो-टेक्नॉलजी के जनक माने जाते हैं। उनकी पत्नी माधुरी ' रिलायंस लाइफसाइंसेज ' के निदेशक का पद छोड़ चुकी हैं। पति-पत्नी के निर्देशन में 22 वैज्ञानिक नैनो-टेक्नॉलजी के विभिन्न क्षेत्रों में शोध कर रहे हैं।
माधुरी बताती हैं कि 26 जुलाई 2005 को मुंबई की सड़कों पर पानी ही पानी नजर आ रहा था। सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों को इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया था , जिसकी वजह से नालियाँ बंद हो जाती हैं। यह आशंका भी जताई जाती रही है कि प्लास्टिक की थैलियां कई पीढ़ियों के लिए सिरदर्द बनेंगी , क्योंकि ये हजारों साल तक नष्ट नहीं होंगी।
इन हालात में कल्याण के बिरला कॉलेज में सीएसआईआर की सहायता से बने भारत के एकमात्र ' नैनो बॉयो-टेक्नॉलजी सेंटर ' में युद्धस्तर पर काम शुरू हुआ। महीने भर में प्लास्टिक को पिघलाकर मोम (वैक्स) बनाने की तकनीक विकसित की गई। इस वैज्ञानिक जोड़ी ने सितंबर 2005 को महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर बताया कि प्लास्टिक के संकट पर हल निकाल लिया गया है। लेकिन ाज तक सरकार ने उनके पत्रका जवाब देना तक उचित नहीं समझ है। लेिकन इनकी उपलब्धि की चमक केंद्रीय पर्यावरण विभाग तक पहुँची और दिल्ली में प्लास्टिक से वैक्स बनाने का संयंत्र कागजों पर दौड़ लगा रहा है। यह संयंत्र वास्तव में आकार ले पाता , इससे पहले शरण दंपती की लैब में प्लास्टिक से पेट्रॉलियम बनाए जाने की नई खबर ने हलचल मचा दी है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ' क्लीन फ्यूल ' है। न तो परीक्षण में किसी तरह की जहरीली गैस निकलती है , न ही कोई केमिकल कचरा बचता है। सभी कुछ या तो वैक्स या पेट्रॉल में बदल जाता है या फिर मीथेन गैस में , जिसका उपयोग फिर ऊर्जा के तौर पर किया जा सकता है। एक और बात यह भी कि इस पेट्रोल में खतरनाक लेड बिल्कुल नदारद है।
महेश्वर आईआईटी (मुंबई) के केमिकल टेक्नॉलजी विभाग से सेवा निवृत्त चुके हैं। वे भारत में कार्बन नैनो-टेक्नॉलजी के जनक माने जाते हैं। उनकी पत्नी माधुरी ' रिलायंस लाइफसाइंसेज ' के निदेशक का पद छोड़ चुकी हैं। पति-पत्नी के निर्देशन में 22 वैज्ञानिक नैनो-टेक्नॉलजी के विभिन्न क्षेत्रों में शोध कर रहे हैं।
माधुरी बताती हैं कि 26 जुलाई 2005 को मुंबई की सड़कों पर पानी ही पानी नजर आ रहा था। सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों को इस बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया था , जिसकी वजह से नालियाँ बंद हो जाती हैं। यह आशंका भी जताई जाती रही है कि प्लास्टिक की थैलियां कई पीढ़ियों के लिए सिरदर्द बनेंगी , क्योंकि ये हजारों साल तक नष्ट नहीं होंगी।
इन हालात में कल्याण के बिरला कॉलेज में सीएसआईआर की सहायता से बने भारत के एकमात्र ' नैनो बॉयो-टेक्नॉलजी सेंटर ' में युद्धस्तर पर काम शुरू हुआ। महीने भर में प्लास्टिक को पिघलाकर मोम (वैक्स) बनाने की तकनीक विकसित की गई। इस वैज्ञानिक जोड़ी ने सितंबर 2005 को महाराष्ट्र सरकार को पत्र लिखकर बताया कि प्लास्टिक के संकट पर हल निकाल लिया गया है। लेकिन ाज तक सरकार ने उनके पत्रका जवाब देना तक उचित नहीं समझ है। लेिकन इनकी उपलब्धि की चमक केंद्रीय पर्यावरण विभाग तक पहुँची और दिल्ली में प्लास्टिक से वैक्स बनाने का संयंत्र कागजों पर दौड़ लगा रहा है। यह संयंत्र वास्तव में आकार ले पाता , इससे पहले शरण दंपती की लैब में प्लास्टिक से पेट्रॉलियम बनाए जाने की नई खबर ने हलचल मचा दी है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ' क्लीन फ्यूल ' है। न तो परीक्षण में किसी तरह की जहरीली गैस निकलती है , न ही कोई केमिकल कचरा बचता है। सभी कुछ या तो वैक्स या पेट्रॉल में बदल जाता है या फिर मीथेन गैस में , जिसका उपयोग फिर ऊर्जा के तौर पर किया जा सकता है। एक और बात यह भी कि इस पेट्रोल में खतरनाक लेड बिल्कुल नदारद है।
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